सुधीर कुमार

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भारत में सरोगेसी व दोमुँहा समाज

Posted On: 18 Nov, 2015 social issues में

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भारत में सरोगेसी व दोमुँहा समाज…
……….
भारत में किराये के कोख(सरोगेसी) का बाजार फलता-फूलता जा रहा है।आंकडों के लिहाज से भारत में सरोगेसी का बाजार लगभग 63 अरब रुपये से ज्यादा का है।यह नयी वैज्ञानिक तकनीक दिन-ब-दिन लोकप्रिय होती जा रही है।वहीं,दूसरी तरफ सरोगेट माताओं को काफी परेशानियों का सामना करना पडता है।उसे उचित पारिश्रमिक नहीं मिल पाती है।चूंकि किराये पर कोख धारण करने वाली महिलाएं निम्न आय वर्ग से संबंधित होती हैं इसलिए भी वह आर्थिक व शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं।क्लिनिक से संबद्ध डाॅक्टर सरोगेसी विधि अपनाने वाले दंपतियों से अच्छी-खासी रकम तो वसूलते हैं लेकिन कष्ट सहने वाली औरतों को कम कीमत पर ही राजी कर लेते हैं।कई देशों में सरोगेट मां के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं,पर भारत में ऐसा कुछ नहीं है।हमारे समाज में तो संतान सुख से वंचित रहने वाली महिलाओं को सहयोग देने की बजाय उन्हें कलंकित,अपशगुन समझा जाता है तथा अनेक तरह से प्रताड़ित भी किया जाता है।आजादी के छह दशक बाद भी ऐसी निकृष्ट सोच हमारी रुढ़िवादी व दकियानूसी विचारधारा को परिलक्षित करता है।इस दृष्टि से सरोगेसी की नवीन वैज्ञानिक अवधारणा संतान सुख से वंचित महिलाओं की भावनात्मक कमी को दूर करने में बहुत हद सफलता प्राप्त की है।शहरों में इसका इस्तेमाल अधिक हो रहा है लेकिन शिक्षा,जागरुकता और पैसे के अभाव के कारण इसकी पहुंच हमारे गांवों तक नहीं हो पायी है।आलम यह है कि मां न बन पाने की स्थिति में गांवों में महिलाओं को शक की नजर से देखा जाता है.आज भी देश के अधिकांश गांवों में जिन महिलाओं के बच्चे नहीं होते हैं उन्हें चिकित्सक को दिखाने की बजाय घरवाले नीम-हकीम और ओझाओं के पास ले जाते हैं।यहां तक की घर में स्थापित देवी-देवताओं से मन्नतें मांगी जाती हैं,बलि भी चढाई जाती है.जाहिर है,इससे फायदा नहीं होता है।नतीजतन ससमय मेडिकल जांच की अनुपलब्धता से एक स्त्री ताउम्र निःसंतान होने के कारण अंदर ही अंदर आंसुओं के सैलाब में अपनी जिंदगी गुजार देती है।संतान की कमी स्त्रियों के मन को कचोटता रहता है।

▪सुधीर कुमार

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

devinder के द्वारा
19/11/2015

 देश के लगभग १० प्रतिशत लोग संतान हीनता के शिकार हैं .प्रदूषण ,मिलावटी ,कीटनाशक युक्त भोजन इस समस्या को बढाता जा रहा है ..हिन्दुओं में एक विवाह प्रथा की वजह से संतान हीन लोगों के लिय सोरोगेसी ही एकमात्र रास्ता बचता है .गाँव  की बात तो छोड़े शेहेर  में भी  इस के बारे में जागरूकता नहीं . इस में सब से बड़ी समस्या सोरोगेट माँ बनने के लिए तैयार महिला ढूढना है  जो की निम्न वर्ग से आती हैं .ऐसे में न तो डॉक्टर ही और न ही निसंतान व्यक्ति का ही उन से संपर्क होता है बिचोलिए ही एकमात्र संपर्क सूत्र होते हैं .यह बिचोलिए ही इन महिलाओं को सोरोगेट माँ बनने के  लिए तयार करते हैं और ज्यादा पैसा लेते हैं  . सरकार को महिलाओं को सोरोगेट बनने के लिए प्रेरणा प्रोग्राम शुरू करने चाहिय .अच्छा हो अगर स्वय सेवी संस्थाएं आगे आयें और अंगदान  की तर्ज़ पैर कोख्दान भी शुरू किया जाए .इस तरेह बिना पैसे लिए निसंतान दम्पति की मदद करनें वाली महिला को दूसरी माँ का दर्ज़ा दिया जाए और बच्चे से जुड़े सभी धार्मिक  और सामाजिक कार्यक्रम में उचित सम्मान दिया जाय

Shobha के द्वारा
21/11/2015

श्री सुधीर गरीबी कुछ भी करा रही है बहुत बड़ी समस्या जिसे हम छोटा आंक रहे हैं उस प्रश्न को उठाता बहुत अच्छा लेख

सुधीर कुमार के द्वारा
22/11/2015

ji mahashaya..dhanyawaad

सुधीर कुमार के द्वारा
22/11/2015

Bilkul sahi baat kahi hai aapne sir..pratikriya ke liye aapka dhanyawaad


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