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आत्महत्या की भेंट चढ़ रहा अनमोल जीवन!

Posted On 11 May, 2016 Social Issues, लोकल टिकेट में

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बीते दिनों पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान में कार्यरत महिला वैज्ञानिक ने फांसी लगा खुदकशी कर ली।33 वर्षीय इस महिला ने सुसाइड नोट में अपनी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया और न ही आत्महत्या के कारण के बारे में लिखा।इस घटना के ठीक कुछ दिनों पहले प्रतिष्ठित बीएचयू के इतिहास विभाग की एक महिला असिस्टेंट प्रोफेसर ने सिर्फ इसलिए फांसी लगा ली थी कि उसके होने वाले मंगेतर ने सगाई के ठीक एक सप्ताह पहले उनसे शादी करने से इंकार कर दिया था।वह इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकी और एक गलत कदम ने उसका बसा-बसाया जीवन बर्बाद कर दिया।फिर,खुदकुशी के पहले लिखे परंपरागत सुसाइड नोट में उन्होंने किसी कारण का उल्लेख नहीं किया।आश्चर्य की बात है कि लोग सुसाइड नोट लिखने की हिम्मत तो कर लेते हैं,लेकिन लिखते समय वे यह नहीं सोच पाते कि वह कैसा अपराध करने जा रहे हैं।सुना था,पढ़े-लिखे लोग समझदार होते हैं।कोई भी काम करने से पहले वे उसके परिणाम के बारे में सोचते हैं।फिर,पढ़े-लिखे लोग ऐसे घिनौने काम क्यों कर बैठते हैं,जिससे समाज में गलत संदेश का प्रचार होता है।फिर,सुसाइड नोट लिखने या ना लिखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।आत्महत्या का ख्याल आते समय अथवा सुसाइड नोट लिखते समय यदि व्यक्ति अपने परिवार,रिश्तेदार या अन्य किसी शुभचिंतक से संवाद स्थापित कर लेता है,तो इसकी नब्बे फीसदी गारंटी है कि वह आत्महत्या का ख्याल दिल से निकाल देगा।लेकिन नहीं,ऐसा करना भी तो अब आसान नहीं।अब लोगों में मैत्रीपूर्ण संबंधों और विश्वासों में कमी आ गई है।हमारी परेशानी सुनकर सामने वाला कैसी प्रतिक्रिया देगा?इसका भय हमें सताता है।निरंतर विकसित तथा आधुनिक होते भारतीय समाज की यह बड़ी क्षति है कि यहां लोगों में एक-दूसरे के साथ ‘कम्यूनिकेशन गेप’ बढ़ता जा रहा है।जिस कारण,व्यक्ति अपनी परेशानी किसी से साझा करने से हिचकिचाता है।अब,बच्चों का अपने माता-पिता से संबंधों में खुलापन का अभाव दिखाई पड़ता है।छोटी उम्र से ही बच्चे अपने अभिभावक से बातें छिपाना शुरु कर देते हैं,जो आगे चलकर बड़ी परेशानी का रुप ले लेता है।विगत कुछ वर्षों में लोगों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास की भावना भी कम हुई है,जिस कारण,छोटी-बड़ी समस्याओं का हल निकालने की कोशिश करने की बजाय,उसे हम अपने मन में दबा लेते हैं,जो कालांतर में तनाव,दबाव तथा अवसाद को जन्म देता है।सही समय पर सही गाइडेंस के अभाव में प्रतिवर्ष लाखों लोग स्वेच्छा(मजबूरी)से अपनी जीवनलीला विभिन्न कारणों से समाप्त कर देते हैं।सोशल मीडिया के दिनचर्या में शामिल होने के बाद अब व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा व्यवहार में बदलाव को स्वतः महसूस किया जा सकता है।अब व्यक्ति समाज से पूरी तरह कट चुका है और सोशल मीडिया को ही समाज,जबकि चैटिंग वाले मित्रों को ही अपने परिवार के सदस्य की तरह मान रहा है।इस तरह,दिनभर फोन से चिपके रहने से व्यक्ति में सामाजिकता के गुणों का ह्रास होता जा रहा है।किताबों से दूर रहने के कारण अब हमारी रचनात्मकता दम तोड़ रही हैं।पैसा और शोहरत पाने की होड़ में जीवन की कई महत्वपूर्ण चीजें छूटती जा रही हैं।पहले के समाज में ऐसी घटनाएं कम होती थी।तब,लोगों में जीवटता थी।संयुक्त परिवार में आपको अपने मन की बात रखने के लिए बड़ों का सहयोग मिलता था।लेकिन,अब समाज में लोगों के बीच रहते हुए भी व्यक्ति एकाकी जीवन जीने को विवश है।आधुनिकता के शीर्ष पर बैठे लोगों का व्यवहार,अब समाज द्वारा अर्जित संस्कार और परंपरा नहीं,बल्कि टीवी,सिनेमा और सोशल मीडिया द्वारा नियंत्रित होता है।परंपरागत पालन-पोषण से दूर होने के कारण बच्चे छोटी उम्र से ही स्व-केंद्रित होते जा रहे हैं।कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं।धीरे-धीरे बच्चा अपने माता-पिता से सारी बातें छिपाने लगता है।अपनी परेशानियों को वह बिना किसी मदद स्वयं सुलझाने लगता है।और,जब स्थिति संभली नहीं जाती,तो गलत कदम उठाने पर मजबूर हो जाता है।धीरे-धीरे यही प्रवृति उसे अवसाद की ओर ले जाती है।
‘कोचिंग’ का हब बन चुके राजस्थान का कोटा शहर अब ‘आत्महत्या का हब’ बनने जा रहा है।यहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से देशभर से आए छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति आम होती जा रही है।अभी हाल ही में दो और बच्चों द्वारा खुदकुशी कर लिये जाने की खबरें आईं।वे,छात्र जो देश के भावी कर्णधार हैं,जिनसे देश को संवारने की उम्मीद हैं,वह छोटी-सी असफलता(या उसका डर)बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है।यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और अभिभावकों के विश्वास की एक बड़ी नाकामी है।बताते चलें कि कुछ माह पूर्व लघु समय में ही पचास से अधिक छात्रों द्वारा किये जाने वाले आत्महत्याओं से व्यथित कोटा जिला के डीएम रवि कुमार ने कोटा के कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले डेढ़ लाख से अधिक छात्रों के अभिभावकों को भावुक होकर एक पत्र लिखा था।इसमें,उन्होंने अनुरोध किया है कि वे(अभिभावक),अपने बच्चों पर जबरन अपनी अपेक्षाएं नहीं थोपें।कलेक्टर के पांच पृष्ठों का यह पत्र शहर के कोचिंग संस्थानों को भेजा गया है,जिसे हिंदी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अनुदित करके छात्रों के माता-पिता को भेजा जाएगा।युवा छात्रों की खुदकुशी की घटनाओं का हवाला देते हुए जिला कलेक्टर ने लिखा कि इन बच्चों के माता पिता की उनसे जो कुछ भी उम्मीदें थीं,उनकी बनावटी दुनिया में जीने के बजाय उन्होंने मौत को गले लगाना आसान समझा।उन्होंने लिखा,‘उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए डराने धमकाने के बजाय,आपके सांत्वना के बोल और नतीजों को भूलकर बेहतर करने के लिए प्रेरित करना,उनकी कीमती जानें बच सकता है।’अपने पत्र में भावुक अपील करते हुए इन छात्रों के माता पिता से कहा,‘अपनी अपेक्षाओं और सपनों को जबरन अपने बच्चों पर नहीं थोपें,बल्कि वे जो करना चाहते हैं,जिसे करने के वे काबिल हैं,उन्हें वही करने दें।’दरअसल,परीक्षा के दौरान या परिणाम के उपरांत छात्रों को तनाव और अवसाद से घिरा हुआ देखा जा सकता है।ऐसे में जब घरवाले उनकी भावनाओं को समझे बिना कुछ बोल देते हैं,तो वह खुदकुशी की कोशिश करने लगता है।कोटा में पढ़ रहे छात्र मानसिक दबाव में रहते हैं।देर रात जागकर पढ़ना,फिर सुबह विलंब से उठना और हड़बड़ाहट में कक्षाओं में जाना।इस हालत में भोजन और स्वास्थ्य से ध्यान हटना लाजिमी है।यह स्थिति छात्रों को तनाव और अवसादग्रस्त बनाता है।परीक्षा में किसी भी तरह की असफलता वह बर्दाश्त नहीं कर पाता है।यह हाल सिर्फ कोटा का नहीं है,बल्कि कोचिंग के लिए विख्यात पटना,रांची,इलाहाबाद,भोपाल,बंगलुरु आदि शहरों का भी है।आए दिन इन शहरों से भी आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं।मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मनसुख एल मंडाविया और सीपी नारायणन के एक सवाल के लिखित जवाब में बताया था कि 2014 में देशभर में 8068 छात्रों ने विभिन्न कारणों से खुदकुशी कर ली।जबकि,2013 और 2012 में यह आंकड़ा क्रमशः 8423 और 6654 था।बड़ी संख्या में छात्र जीवन में अपने लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व अपना जीवन छीन ले रहे हैं।वर्तमान शिक्षा व्यवस्था छात्रों में असंतोष को जन्म दे रही है।गुणवत्तापूर्ण तथा रोजगारपरक शिक्षा के अभाव में देश में शिक्षित बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है,तो दूसरी तरफ प्रतिस्पर्धी हो रही शिक्षा से औसत दर्जे के छात्रों में हीनता की भावना बलवती हो रही है,जो उनके आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं।आज बच्चों पर सपने थोपे जा रहे हैं।उन्हें बताया जा रहा है कि नंबर ही सबकुछ है।90-95 तथा इससे अधिक फीसदी अंक वाले छात्रों का ही नामांकन देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में हो रहा है।शेष औसत दर्जे के छात्रों में निराशा घर कर रही है।
छात्र ही नहीं,देश के सभी वर्ग के लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति आम हो चुकी है।खासकर,परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों से विरत हो रहे युवावर्ग में इसका प्रचलन आम हो चुका है।बड़ी संख्या में लोग जीवन-त्यागने की इस शार्टकट विधि द्वारा सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों को तिलांजली देते हुए अपना बहुमूल्य जीवन त्याग रहे हैं।समाज के हर वर्ग में हताशा के भाव देखने को मिल रहे हैं।आर्थिक उन्नति व सुख समृद्धि के बावजूद लोग खुश नहीं हैं।हाल ही में,115 देशों में खुशी के स्तर पर कराये गये शोध से पता चला कि भारत उसमें 111वें स्थान पर है।शायद इसीलिए,देश में प्रतिवर्ष लाखों लोग अपनी व्यक्तिगत,पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं से तंग आकर आत्महत्या कर निरुद्देश्य अपनी इहलीला समाप्त कर देते हैं।यहां के लोग खुश नहीं हैं,इसलिए बीमारियां भी बढ़ती जा रही हैं।आज लोगों को छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से लड़ते देखा जा सकता है,एक दूसरे के प्रति लोगों में विद्वेष की भावना है।साफ अर्थ यह है कि आज लोग संतुष्ट नहीं हैं।दूसरी ओर,नागरिकों में ‘संवेदनशीलता’ मृतप्राय हो रही है,जबकि ‘सहिष्णुता’ बस हिन्दी शब्दकोश तक ही सीमित रह गया है।विवाहित पुरुष बड़ी आसानी से पंखे से लटक कर अपनी इहलीला समाप्त कर देते हैं,लेकिन इसके बाद विधवा हो चुकी पत्नी और अनाथ हो चुके बच्चे का भान नहीं रहता।पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारियों से पिंड छुड़ाने का एक नायाब तरीका निकल आया है।कोई भी,किसी भी तरह की समस्या सामने दिखाई दे या किसी ने भले के लिए ही कुछ बुरा कह दिया,तो परिणाम आत्महत्या तक चला जाता है।इस तरह समाज में रहने के बावजूद लोग सामाजिक नहीं हो पा रहे हैं।
नेशनल क्राइम रिकोर्ड ब्यूरो के ताजे आंकड़ों के मुताबिक 2014 में 1,36,666 लोगों ने आत्महत्या कर ली थी।गौरतलब है कि इसमें 18 से 30 आयुवर्ग के लोगों की संख्या सर्वाधिक 44,870 थी।जबकि 14-18 वर्ग के बीच आत्महत्या करने वाले किशोरों की संख्या 9,230 थी।कुल मिलाकर देखा जाए तो आत्महत्या के उक्त आंकड़ों में नवयुवक-युवतियों का अनुपात 40 है।यह सच्चाई उस राष्ट्र की है,जो अपने 35 करोड़ युवाओं के बल पर इठला रहा है।विडंबना यह है कि अपनी उपयोगिता साबित करने की बजाय युवा अनुचित मार्ग अपनाकर अपना जीवन निरुद्देश्य समाप्त करने पर तूले हैं।यह विडंबनात्मक स्थिति हमारे समाज,सरकार और लोगों को मिलने वाले संस्कार पर सवाल उठाती हैं।भारत जैसे गौरवशाली व सांस्कृतिक विविधता से संपन्न देश में नागरिकों का अपने जीवन के प्रति यह लापरवाही कई सवाल खड़े करती है।भारत जैसा देश,जो आदिकाल से ही विश्व को हंसना और जीना सीखाया है,वहां आज लोग कथित अवसाद या जीवन में उत्पन्न छोटी-बड़ी समस्याओं के आगे घुटने टेककर अपनी जीवनलीला समाप्त कर रहे हैं।आधुनिकता के पथ पर निरंतर अग्रसर भारतीय समाज की यह बड़ी विडंबना है कि यहां अशिक्षित ही नहीं,बल्कि शिक्षा प्राप्त लोग भी बड़े पैमाने पर आत्महत्या कर अपने अनमोल जीवन को बेबसी की भेंट चढ़ा रहे हैं।कार्यशील जनसंख्या के अंतर्गत लोगों की यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय विकास के मार्ग में बाधक बन रही है।अपनी उत्पादकता,जोश व जज्बे को देशहित में लगाने की बजाय कुछ लोग कायरता का मार्ग अख्तियार कर समाज में गलत संदेश का दुष्प्रचार कर रहे हैं।संसाधनों में श्रेष्ठ मानव संसाधन के असमय नाश होने से देश में कई सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सृजन हो रहा है।दूसरी तरफ,किसी व्यक्ति के ऐसे कृत्य से संबद्ध परिवार व समाज की मनोदशा पर इसका बुरा असर पड़ता है।
देश के किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।केंद्र सरकार के आकड़े बताते हैं कि 2016 के शुरुआती 3 महीने में ही 116 किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी है।बीते वर्ष,खुदकुशी के कारण देश ने 3000 किसानों को खोया था।जबकि,पिछले 20 सालों में असंख्य किसानों ने अपना जीवन त्याग दिया।वर्तमान में देश में सूखे से जूझते एक दर्जन राज्यों में विपदा ग्रस्त किसानों का आत्महत्या के प्रति झुकाव बढ़ सकता है।वे किसान,जो अन्नदाता हैं,अपनी मेहनत से देश के सवा अरब जनसंख्या के पेट की आग बुझाते हैं,वे आज अपने पेट की आग नहीं बुझा पा रहे हैं।प्राकृतिक प्रकोप और ऊपर से सरकारी उदासीनता के कारण अन्नदाता दाने-दाने को मोहताज नजर आ रहे हैं।ऐसे में,जब हालात बद से बदतर हो जाते हैं,तब वे मजबूरन आत्महत्या को गले लगाते हैं।मगर क्या यह समस्या का स्थायी समाधान है?परिवार के मुखिया के असमय चले जाने से घर पर दोहरी विपदा पड़ जाती है।दूसरी तरफ,बैंकों और महाजन साहूकारों का कर्ज भी व्यक्ति को ऐसे काम करने की ओर ढकेलता है।बीते दिनों ठाणे में हसनैन वारेकर नामक आरोपी ने अपने ही परिवार के 14 सदस्यों की नृशंस हत्या कर स्वयं भी खुदकुशी कर ली।ज्ञात हुआ कि उसपर 67 लाख रूपये का कर्ज था।
बहरहाल,आत्महत्या की यह प्रवृत्ति भारतीय संस्कृति परंपरा के साथ कुठाराघात है।भारतीय संविधान,अनुच्छेद 21 के अंतर्गत देश के समस्त नागरिकों की जीवन की सुरक्षा का अधिकार देता है।यही नहीं,राज्य को इसके लिए अनुकूल दशाओं के निर्माण के आदेश हैं।अगर किसी व्यक्ति की भूख से भी मौत हो जाती है,राज्य सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं।मानवाधिकार आयोग के सदस्य सरकार पर लगातार दबाव बनाते हैं,ताकि आगे ऐसी मौत न हो।जबकि,मरणासन्न लोगों को भी सर्वोच्च न्यायालय इच्छामृत्यु की भी इजाजत नहीं देता।इतनी व्यवस्था होने के बाद जब व्यक्ति खुद अपने पैर कुल्हाड़ी मारे,तो यह उनकी घनघोर मूर्खता है।
जीवन अनमोल है।हर बार इंसान रुप में जन्म लेना संभव नहीं है।हमें इसकी उपयोगिता सिद्ध करने पर बल देना चाहिए।मानव इतना सामर्थ्यवान है कि वह मैली हो चुकी पृथ्वी का विकल्प ढूढ़ने निकल पड़ा है,तो क्या वह अपनी छोटी-सी व्यक्तिगत समस्या का हल नहीं निकाल सकता?आत्महत्या किसी भी समस्या का हल नहीं है।यह एक नैतिक अपराध है।यह व्यक्ति की मूर्खता और कायरता का परिचायक है।समस्याएं हैं,तो उसका समाधान भी है।हालांकि,किसी व्यक्ति के इस कृत्य के लिए केवल भुक्तभोगी को दोषी ठहराया नहीं जा सकता।समाजशास्त्री इमाइल दुर्खिम कहते हैं कि आत्महत्या व्यक्तिगत न होकर समाजपोषित है,क्योंकि समाज ही ऐसे जहरीले परिवेश का निर्माण करता है,जहां व्यक्ति खुद को असहाय-सा महसूस करता है।
मानव जीवन ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ उपहार है।शायद हम अपने जीवन का मोल नहीं समझ रहे हैं।पशु भी प्रताड़ित होते हैं।निर्दोष पशुओं पर मनुष्यों द्वारा जुल्म की इंतहा कर दी जाती हैं।पर कभी देखा है उसे आत्महत्या करते?फिर,हमारी स्थिति पशुओं से उच्च व श्रेष्ठ होने की बजाय कायरतापूर्ण कैसे हो गयी?परेशानी किसे नहीं है?जीवन तो दुख-सुख का संगम है।दरअसल,लोगों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार और विश्वास में कमी आने के कारण हमें अपनी मानसिक या शारीरिक समस्याओं को दूसरे के समक्ष रखने में झिझक होने लगी है।परिणामस्वरुप,मन में कुंठा का भाव उठने लगता है और सारी परेशानियों का जड़ हम स्वयं को मानकर एकमात्र उपाय के लिए आत्महत्या की ओर देखते हैं।लेकिन क्या मनुष्य का यह कृत्य कायरता का परिचायक नहीं है?प्रकृति का एक नियम है कि जब यह एक रास्ते बंद करती हैं तो कई खोल भी देती है.बस हमें सकारात्मकता के साथ उसे पहचानने की जरुरत है।किशोरों और युवाओं में ऐसी प्रवृत्ति के प्रचलन में आने से देश का भविष्य अंधकारमय होने की संभावना है।इसके पीछे कारण चाहे जो भी हो,लेकिन इसकी बढ़ती प्रवृत्ति से बहुमूल्य मानव संसाधन का राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान हो रहा है,जो चिंता का विषय है।भारत युवाओं का देश है।यदि यही प्रवृत्ति बरकरार रही,तो भविष्य में इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ सकता है।जीवन में समस्याएं हैं,तो समाधान भी होगा लेकिन आत्महत्या ही अंतिम विकल्प क्यों?आत्मजागरुकता,समझदारी और सतर्कता इसका रामबाण इलाज है।लोगों को,मानव जीवन के औचित्य को समझते हुए इसकी सार्थकता सिद्ध करने पर जोर देना चाहिए।

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सुधीर कुमार,
बीएचयू,वाराणसी
11 मई 2016
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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
11/05/2016

श्री सुधीर जी बहुत अच्छा लेख पढ़ क्र मन बहुत दुखी हुआ पहले अभाव थे इन्सान उनसे लड़ता था अब कुछ के पास सब कुछ है फिर भी जीना नही चाहते

सुधीर कुमार के द्वारा
11/05/2016

यही तो हमारा दुर्भाग्य है।मानव जीवन पाना दुर्लभ है,किंतु हम इसका महत्व नहीं समझ रहे हैं।हमेशा की तरह,इस बार भी पहला कमेंट आपका ही मिला।खुशी हुई।धन्यवाद महाशया!


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